दिल्ली जैसे अति सुरक्षित कहे जाने वाले जगह में कोबाल्ट 60 का मायापुरी के कबाड़ मार्केट में मिलना कई आशंकाओ को जन्म देता है. विशेषज्ञों का मत है कि कोबाल्ट 60 द्वारा फैलाया गया विकिरण का स्थानीय बाज़ार में जो स्तर मिला है उसका असर 20 वर्षों तक व्याप्त रहने की सम्भावना है .सरकारी आंकरे तो सिर्फ 12 व्यक्तियों पर ही विकिरण के असर को बता रहे हैं लेकिन हताहतों की संख्या इससे ज्यादा है .कुछ तो सामने आ चुके हैं,कुछ भय से छुपे हुए भी हैं या फिर प्राइवेट अस्पताल में अपना इलाज करवा रहे होंगे.
सवाल यह उठता है कि कबाड़ के रूप में कोबाल्ट 60 भारत कि राजधानी दिल्ली में आया कैसे ? भारत स्क्रैप माल का बहुत बरा खरीदार है . और अधिकतर स्क्रैप समुद्री रास्ते से आयातित किये जाते हैं.हमारे देश में तट रक्षक दल हैं,बंदरगाहों पर सतर्कता विभाग के लोग भी कार्यरत हैं हानिकारक पदार्थों से लदे जहाज से माल आख़िरकार किस तरह से उतरने दिया गया ???.फिर कबाड़ के रूप में ये माल कई एक राज्य की सीमा से पार किया गया होगा.प्रत्येक राज्य कि सीमा पर गस्ती पुलिस दल भी रहते हैं .क्या कोबाल्ट 60 से लदी गारी पर किसी भी निरीक्षक दल का ध्यान नहीं गया ??? या फिर हमारे रक्षकों के पास ऐसे जांच यन्त्र उपलब्ध ही नहीं है . जिससे कि यह पता कर सके कि अमुक गारी में हानिकारक / विस्फोटक पदार्थ लादे हुए हैं . दोनों ही स्थिति क्षोभ पैदा करती है.
देखिये मेरा इरादा व्यवस्था की खामियों को गिनाना या पुलिस बल का मनोवल गिराना नहीं है .मेरा इरादा तो सिर्फ इतना इशारा करना भर है कि भारतीय भू-भाग के अन्दर कई एक विध्वंसकारी संगठन सक्रिय हैं कोई गरीबी,भुखमरी के नाम पर हथियार उठाये हुए है तो कोई धर्म ,नस्ल भाषा व प्रांत के नाम पर .एक बार फिर शांत मन से यह तो सोचना ही होगा कि आखिर इन सब के पास हथियार या विस्फोटक पदार्थों या जीवन मारक धातुओं का जखीरा आता कैसे है ?
दंतेवाड़ा में मारे गए लोग हमारे थे, हथियार गैरों का था. लेकिन सभी मानवाधिकारवादी संगठन ख़ामोशी अख्तियार किए हुए हैं . उन्हें 76 रक्षकों कि मौत-मौत नहीं लगती .क्यूंकि वे व्यवस्था पोषक थे. कोबाल्ट 60 का विकिरण ने भी हमला हमारे लोगों पर ही किया है . अब समय सोने का नहीं है समय है देश कि रक्षा का भार अपने ऊपर उठाने का .मनभ्रमित लोगों के भ्रम को दूर करने का है कि " ये देश है तुम्हारा आओ इसे सजाएँ मिलकर ". विकास की रौशनी अगर उन तक नहीं पहुंची है तो आने वाले वक़्त में विकास अपना रास्ता बनाते हुए खुद व खुद उन तक पहुंचेगा.वह देश विरोधी ताक़तों के हाथों में न खेले .इस तरह के दुष्कर्मों से न तो उनका भला होने वाला है न ही उन लोगों का जिनके नाम पर वह खून खराबा कर रहे हैं.
"लहू पूछे है तुझसे बता मेरा रंग है क्या
आवो हवा तो एक ही है हो न हो तुझ सा है क्या "
शनिवार, 17 अप्रैल 2010
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