मायापुरी के कबाड़ मार्केट में मिले खतरनाक रेडियो आइसोटॉप कोबाल्ट-60 का स्रोत दिल्ली विश्व विध्यालय के केमिस्ट्री विभाग चिन्हित होने पर हर भारतीय को गहरा क्षोभ हुआ होगा ऐसा उम्मीद करता हूँ . कोबाल्ट 60 से रेडिएशन फैलता है यह बात 10 वीं में पढने वाले बच्चे को भी मालूम है . फिर भी सारे नियमों और कायदों को ताक पर रख कर के अन्य कबाड़ के साथ-साथ कोबाल्ट 60 की खुली नीलामी प्रोफेसरों की कुत्सित मानसिकता को ही बताता है . दिल्ली विश्व विद्यालय प्रशासन से जुरे कुछ व्यक्तियों का समाज के प्रति यह गैर जिम्मेदाराना और आपराधिक रवैया रहा है .
जिस दिल्ली विश्वविध्यालय ने भारत को कई एक समाजसेवी,राजनेता,वैज्ञानिकों,
फिलहाल तो दिल्ली प्रशासन के द्वारा आईपीसी की धारा 304-ए के तहत अज्ञात लोगों के खिलाफ लापरवाही से हुई मौत की एफआईआर दर्ज करवा दी गयी है।लेकिन जो नुकसान हो चुका है क्या उसकी भरपाई की जा सकती है ? अभी तो सिर्फ एक आदमी राजेंद्र ही इसके चपेट में आ कर के अपनी जान गंवाया है. हाँ दिल्ली सरकार ने मेरे बयान देने के बाद जिसमें मेरे कुछ पत्रकार मित्रों की उल्लेखनीय भूमिका रही है-"जिसमें हमने दिल्ली प्रदेश जनता दल-यूनाइटेड के महासचिव व प्रवक्ता होने की हैसियत से दिल्ली सरकार से राजेंद्र के परिवार को 10 लाख रुपये व उसके किसी एक आश्रित को सरकारी नौकरी देने की मांग की थी."दिल्ली की स्वास्थ्य मंत्री किरण वालिया जी राजेंद्र के परिवार को 2 लाख रुपये एवं उसके बच्चों के पठन-पाठन की व्यवस्था करने की घोषणा कर चुकी है.इस एवज में मै किरण वालिया जी के संवेदनशील मन का सम्मान करता हूँ और उनका आभार प्रकट करता हूँ .वहीं दिल्ली विश्व विद्यालय ने 8 लाख रुपये और उसके परिवार के किसी सदस्य को नौकरी देने की बात कही है . सवाल अभी भी वहीं है कि क्या राजेंद्र वापस आ सकता है .उसके बच्चों को उसके पिता राजेंद्र का प्यार- दुलार और संरक्षण मिल सकता है ?
जवाब तो नहीं में ही आएगा न? लेकिन और वह लोग जो मायापुरी के कबाड़ मार्केट में काम कर रहे हैं रेडियेशन के चपेट में शायद वह भी हों. कुछ अस्पतालों में भर्ती हैं लेकिन वहां के डाक्टर भी उनकी जीवन को लेकर के आश्वस्त नहीं हैं एक दिन अगर उनका स्वास्थ्य ठीक होता है तो दुसरे दिन उतने ही तेज़ी से गिरता भी है.थोरी सी लापरवाही ने कई लोगों कि ज़िन्दगी को खतरे में डाल दिया है.
सबाल एक और भी है - इस खतरनाक कबाड़ की नीलामी में एटॉमिक एनर्जी एक्ट के किन- किन नियमों की अनदेखी की गई और क्यों नहीं नीलामी से पूर्व संबंधित संस्थानों की अनुमति ली गयी ? क्या दिल्ली प्रशासन अब तक कान में तेल दाल कर सो रही थी ? अब इसका जवाब तो दिल्ली की शीला सरकार को ही देना होगा. वहीं केंद्र की मनमोहन सरकार अपने दायित्वों से मुक्त नहीं हो सकती है क्यूंकि परमाणु ऊर्जा विभाग उसी के पास है !!!
कपिल सिब्बल केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री हैं.उनकी नाक के नीचे यू.जी.सी है. प्रयोगशाला के लिए तो प्रत्येक विश्व विद्यालयों के भौतिकी, रसायन,लाइफ साइंस, बायोटेक्नोलॉजी विभागों , में तरह-तरह रासायनिक पदार्थ आते ही रहते हैं .उनमे से ही खतरनाक विकिरण फ़ैलाने वाला कोवाल्ट 60 होगा. प्रयोग के लिए ऐसे पदार्थों का विश्वविद्यालयों में मंगवाना गैर क़ानूनी नहीं है. लेकिन इन पदार्थों का डिस्पोज़ल तो ढंग से करने की जिम्मेवारी विश्वविद्यालय प्रशासन की ही है.
भारत सरकार का परमाणु उर्जा विभाग आखिर क्या कर रहा है ? इस तरह के पदार्थ विधिक तौर पर
विश्वविद्यालयों में या फिर भारतीय वैज्ञानिक संस्थान में आते ही रहते होंगे .क्या परमाणु उर्जा विभाग ने ऐसा कोई भी मापदंड स्थापित नहीं किया है कि इस तरह के पदार्थों का प्रायोगिक तौर पर उपयोग करने के बाद इनका निवारण या नष्ट कैसे किया जाए.अगर इस तरह का मापदंड वह स्थापित किए हुए है तो क्या कोई निगरानी समिति भी है ? अगर निगरानी समिति भी है तो क्या वह सही ढंग से काम कर रही है ???
जाहिर सी बात है कि ऐसा नहीं हो रहा है अगर ऐसा होता ही तो पढ़े-लिखे लोग शिक्षा प्रदान करने वाले लोग "मौत "को कबाड़ के हाथों नीलाम नहीं करते .उसको नष्ट करने का उपाय करते.यहाँ मानव संसाधन मंत्री का सबसे पहला कदम दोषी प्रोफेसरों को बर्खास्त करने का होना चाहिए .बाद बांकी काम भारत का कानून खुद ही कर लेगा.
जय हिंद, जय जनता, जय युवा

