शनिवार, 1 मई 2010

जिम्मेदारों की लापरवाही



मायापुरी के कबाड़ मार्केट में मिले खतरनाक रेडियो आइसोटॉप कोबाल्ट-60 का स्रोत दिल्ली विश्व विध्यालय के केमिस्ट्री विभाग चिन्हित होने पर हर भारतीय को गहरा
क्षोभ हुआ होगा ऐसा उम्मीद करता हूँ . कोबाल्ट 60 से रेडिएशन फैलता है यह बात 10 वीं में पढने वाले बच्चे को भी मालूम है . फिर भी सारे नियमों और कायदों को ताक पर रख कर के अन्य कबाड़ के साथ-साथ कोबाल्ट 60 की खुली नीलामी प्रोफेसरों की कुत्सित मानसिकता को ही बताता है . दिल्ली विश्व विद्यालय प्रशासन से जुरे कुछ व्यक्तियों का समाज के प्रति यह गैर जिम्मेदाराना और आपराधिक रवैया रहा है .

जिस दिल्ली विश्वविध्यालय ने भारत को कई एक समाजसेवी,राजनेता,वैज्ञानिकों,प्रशासनिक अधिकारियों खिलारियों, अधिवक्ताओं ,पत्रकारों की एक बरी फ़ौज खरी कर के दी है ,उसी दिल्ली विश्वविद्यालय का गरिमामयी नाम कुछ काले भेरिये ने देश के सामने ख़राब करने का काम किया है.

फिलहाल तो दिल्ली प्रशासन के द्वारा आईपीसी की धारा 304- के तहत अज्ञात लोगों के खिलाफ लापरवाही से हुई मौत की एफआईआर दर्ज करवा दी गयी है।लेकिन जो नुकसान हो चुका है क्या उसकी भरपाई की जा सकती है ? अभी तो सिर्फ एक आदमी राजेंद्र ही इसके चपेट में कर के अपनी जान गंवाया है. हाँ दिल्ली सरकार ने मेरे बयान देने के बाद जिसमें मेरे कुछ पत्रकार मित्रों की उल्लेखनीय भूमिका रही है-"जिसमें हमने दिल्ली प्रदेश जनता दल-यूनाइटेड के महासचिव प्रवक्ता होने की हैसियत से दिल्ली सरकार से राजेंद्र के परिवार को 10 लाख रुपये उसके किसी एक आश्रित को सरकारी नौकरी देने की मांग की थी."दिल्ली की स्वास्थ्य मंत्री किरण वालिया जी राजेंद्र के परिवार को 2 लाख रुपये एवं उसके बच्चों के पठन-पाठन की व्यवस्था करने की घोषणा कर चुकी है.इस एवज में मै किरण वालिया जी के संवेदनशील मन का सम्मान करता हूँ और उनका आभार प्रकट करता हूँ .वहीं दिल्ली विश्व विद्यालय ने 8 लाख रुपये और उसके परिवार के किसी सदस्य को नौकरी देने की बात कही है . सवाल अभी भी वहीं है कि क्या राजेंद्र वापस सकता है .उसके बच्चों को उसके पिता राजेंद्र का प्यार- दुलार और संरक्षण मिल सकता है ?

जवाब तो नहीं में ही आएगा ? लेकिन और वह लोग जो मायापुरी के कबाड़ मार्केट में काम कर रहे हैं रेडियेशन के चपेट में शायद वह भी हों. कुछ अस्पतालों में भर्ती हैं लेकिन वहां के डाक्टर भी उनकी जीवन को लेकर के आश्वस्त नहीं हैं एक दिन अगर उनका स्वास्थ्य ठीक होता है तो दुसरे दिन उतने ही तेज़ी से गिरता भी है.थोरी सी लापरवाही ने कई लोगों कि ज़िन्दगी को खतरे में डाल दिया है.

सबाल एक और भी है - इस खतरनाक कबाड़ की नीलामी में एटॉमिक एनर्जी एक्ट के किन- किन नियमों की अनदेखी की गई और क्यों नहीं नीलामी से पूर्व संबंधित संस्थानों की अनुमति ली गयी  ? क्या दिल्ली प्रशासन अब तक कान में तेल दाल कर सो रही थी  ? अब इसका जवाब तो दिल्ली की शीला सरकार को ही देना होगा. वहीं केंद्र की मनमोहन सरकार अपने दायित्वों से मुक्त नहीं हो सकती है क्यूंकि परमाणु ऊर्जा विभाग उसी के पास है !!!


कपिल सिब्बल केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री हैं.उनकी नाक के नीचे यू.जी.सी है. प्रयोगशाला के लिए तो प्रत्येक विश्व विद्यालयों के भौतिकी, रसायन,लाइफ साइंस, बायोटेक्नोलॉजी विभागों , में तरह-तरह रासायनिक पदार्थ आते ही रहते हैं .उनमे से ही खतरनाक विकिरण फ़ैलाने वाला कोवाल्ट 60 होगा. प्रयोग के लिए ऐसे पदार्थों का विश्वविद्यालयों में मंगवाना गैर क़ानूनी नहीं है. लेकिन इन पदार्थों का डिस्पोज़ल तो ढंग से करने की जिम्मेवारी विश्वविद्यालय प्रशासन की ही है.


भारत सरकार का परमाणु उर्जा विभाग आखिर क्या कर रहा है ? इस तरह के पदार्थ विधिक तौर पर
विश्वविद्यालयों में या फिर भारतीय वैज्ञानिक संस्थान में आते ही रहते होंगे .क्या परमाणु उर्जा विभाग ने ऐसा कोई भी मापदंड स्थापित नहीं किया है कि इस तरह के पदार्थों का प्रायोगिक तौर पर उपयोग करने के बाद इनका निवारण या नष्ट कैसे किया जाए.अगर इस तरह का मापदंड वह स्थापित किए हुए है तो क्या कोई निगरानी समिति भी है ? अगर निगरानी समिति भी है तो क्या वह सही ढंग से काम कर रही है ???


जाहिर सी बात है कि ऐसा नहीं हो रहा है अगर ऐसा होता ही तो पढ़े-लिखे लोग शिक्षा प्रदान करने वाले लोग "मौत "को कबाड़ के हाथों नीलाम नहीं करते .उसको नष्ट करने का उपाय करते.यहाँ मानव संसाधन मंत्री का सबसे पहला कदम दोषी प्रोफेसरों को बर्खास्त करने का होना चाहिए .बाद बांकी काम भारत का कानून खुद ही कर लेगा.



जय हिंद, जय जनता, जय युवा

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

दंतेवाड़ा और कोबाल्ट 60

दिल्ली जैसे अति सुरक्षित कहे जाने वाले जगह में कोबाल्ट 60 का मायापुरी के कबाड़ मार्केट में मिलना कई आशंकाओ को जन्म देता है. विशेषज्ञों का मत है कि कोबाल्ट 60 द्वारा फैलाया गया विकिरण का स्थानीय बाज़ार में जो स्तर मिला है उसका असर 20 वर्षों तक व्याप्त रहने की सम्भावना है .सरकारी आंकरे तो सिर्फ 12 व्यक्तियों पर ही विकिरण के असर को बता रहे हैं लेकिन हताहतों की संख्या इससे  ज्यादा है .कुछ तो सामने आ चुके हैं,कुछ भय से छुपे हुए भी  हैं या फिर प्राइवेट अस्पताल में अपना इलाज करवा रहे होंगे.


सवाल यह उठता है कि कबाड़ के रूप में कोबाल्ट 60 भारत कि राजधानी दिल्ली में आया कैसे ? भारत स्क्रैप माल का बहुत बरा खरीदार है . और अधिकतर स्क्रैप समुद्री रास्ते से आयातित किये जाते हैं.हमारे देश में तट रक्षक दल हैं,बंदरगाहों पर सतर्कता विभाग के लोग भी कार्यरत हैं हानिकारक पदार्थों से लदे जहाज से माल आख़िरकार किस तरह से उतरने दिया गया ???.फिर कबाड़ के रूप में ये माल कई एक राज्य की सीमा से पार किया गया होगा.प्रत्येक राज्य कि सीमा पर गस्ती पुलिस दल भी रहते हैं .क्या कोबाल्ट 60 से लदी गारी पर किसी भी निरीक्षक दल का ध्यान नहीं गया ??? या फिर हमारे रक्षकों के पास ऐसे जांच यन्त्र  उपलब्ध ही नहीं है . जिससे कि यह पता कर सके कि अमुक गारी में हानिकारक / विस्फोटक पदार्थ लादे हुए हैं . दोनों ही स्थिति क्षोभ पैदा करती है.


देखिये मेरा इरादा व्यवस्था की खामियों को गिनाना या पुलिस बल का मनोवल गिराना नहीं है .मेरा इरादा तो सिर्फ इतना  इशारा करना भर है कि भारतीय भू-भाग के अन्दर कई एक विध्वंसकारी संगठन सक्रिय हैं कोई गरीबी,भुखमरी के नाम पर हथियार उठाये हुए है तो कोई धर्म ,नस्ल भाषा व प्रांत के नाम पर .एक बार फिर शांत मन से यह तो सोचना ही होगा कि आखिर इन सब के पास हथियार या विस्फोटक पदार्थों या जीवन मारक धातुओं  का जखीरा आता कैसे है ?


 दंतेवाड़ा में  मारे गए लोग हमारे थे, हथियार गैरों का था. लेकिन सभी मानवाधिकारवादी संगठन ख़ामोशी अख्तियार किए हुए हैं . उन्हें 76 रक्षकों कि मौत-मौत नहीं लगती .क्यूंकि वे व्यवस्था पोषक थे. कोबाल्ट 60 का विकिरण ने भी हमला हमारे लोगों पर ही किया है . अब समय सोने का नहीं है समय है देश कि रक्षा का भार अपने ऊपर उठाने का .मनभ्रमित लोगों के भ्रम को दूर करने का है कि " ये देश  है तुम्हारा आओ इसे सजाएँ मिलकर ". विकास की रौशनी अगर उन तक नहीं पहुंची है तो आने वाले वक़्त में विकास अपना रास्ता बनाते हुए खुद व खुद उन तक पहुंचेगा.वह देश विरोधी ताक़तों के हाथों में न खेले .इस तरह के दुष्कर्मों से न तो उनका भला होने वाला है न ही उन लोगों का जिनके नाम पर वह खून खराबा कर रहे हैं.


"लहू पूछे है तुझसे बता मेरा रंग है क्या
आवो हवा तो एक ही है हो न हो तुझ सा है क्या "

बुधवार, 31 मार्च 2010

राजनीति में अनुलोम-विलोम

                                         योग गुरु बाबा रामदेव ने लोगों को स्वांस लेना और छोरना 
सिखाने के बाद अब राष्ट्रवादी राजनीति सिखाने का संकल्प लिया है. उनका आगामी
राजनैतिक कपालभाती भारतीय राजनीति में क्या गुल खिलायेगा यह तो समय के
गर्भ में है ? लेकिन यह निर्णय  इतना तो बता ही जाता है की राजसत्ता से सहयोग
लेते-लेते वह इतना अधिक सजग  हो गए हैं कि अब वह खुद ही एक राजनैतिक  
दल बनाने की घोषणा कर चुके हैं. हाँ अभी उनमे थोरी सी झिझक बाकी है कि वह
शिव सेना के बाल ठाकरे कि तरह कोई पद न लेने कि बात तो जरूर कह रहे हैं, 
लेकिन इस सम्भावना से तो इंकार नहीं ही किया जा सकता है की उनके द्वारा खरे 
किये उम्मीदवार की वजह से वह अगर राजनैतिक मोल-जोल की स्थिति में पहुँच 
गए तो वह राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के मुखिया तो बन ही सकते हैं. 



 
                                              

                                                         जय हिंद , जय भारत , जय जनता